छोटे बच्चों की आँख आना ओर वयस्क मे आँख आना घरेलू उपचार

मित्रों बारिश के बाद वाइरल संक्रमण आम बात है देश मे खास कर महाराष्ट्र ओर पुणे मे आँख आना संक्रमण फैला हुआ है खास कर छोटे बच्चों की आँख आना कि समस्या अधिक देखि जा रही है । आज के हेल्थ हम जानेंगे आँख आना (डोळे येणे) क्या होता है ?  खास कर छोटे बच्चों की आँख आना कुयँ होता है ओर आँख आना घरेलू उपचार क्या है ।

आँख आना क्या होता है ?

मित्रों आँख आना जीसे हम इंग्लिश मे eye Conjunctivitis आई कंजंक्टिवाइटिस ओर  हिंदी मे “नेत्रश्लेष्मलाशोथ,” के नाम से भी जानते है,यह एक ऐसी आँखों की समस्या है जो तब होती है जब हमारी आंखों के सफेद भाग और पलकों के अंदर की परत को ढकने वाली पतली, पारदर्शी  परत में सूजन या संक्रमण हो जाता है नीचे दिए हुए फोटो मे आप इसे देख कर आसानी से समझ सकते है ।

छोटे बच्चों की आँख आना ओर वयस्क मे आँख आना घरेलू उपचार
छोटे बच्चों की आँख आना ओर वयस्क मे आँख आना घरेलू उपचार

मित्रों आँख आना इसे “पिंक आई” भी  कहते है क्योंकि आँखों की रक्त वाहिकाओं में सूजन के कारण आंख गुलाबी या लाल दिखती है। यह स्थिति बैक्टीरिया या वायरस  के कारण हो होती है, । यदि आपकी आंखें गुलाबी या लाल हैं, तो इससे आपकी आंखों में खुजली, पानी आना और असहजता महसूस होती है तो यह आई कंजंक्टिवाइटिस या आँख आने का लक्षण हो सकता है अच्छी खबर यह है कि यह रोग आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन कभी-कभी, आपको  डॉक्टर की आवश्यकता हो सकती है। मित्रों छोटे बच्चों की आँख आना यह यह जानने से पहेले आँख आने के मूल कारण हमे समझने बहोत जरूरी है ।

आँख आने के कारण क्या है 

मित्रों पहेले हम सभी आयु के व्यक्तियों मे आई कंजंक्टिवाइटिस के कारण देखेंगे उसके बाद छोटे बच्चों की आँख आना इसके कारण देखेंगे जिससे हमे वर्गीकरण करने मे आसानी होगी ओर आप इसे आसानी से समझ सकते है ।  मित्रों आम तोर पर यह 6  कारणों से होता है  ।

1. वायरल संक्रमण:  जैसे आप नाम से जान चुके है वाइरल का मतलब वायरस यह आँख आने का प्रमुख कारण है मित्रों जैसे सामान्य सर्दी,चिकन गुनिया ओर आपक कोरोना वायरस से होता है वैसे ही आई कंजंक्टिवाइटिस कुल 3  वायरस से होता है । इन मे पहिला है हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस (एचएसवी):यह वायरस नेत्रश्लेष्मलाशोथ के अधिक गंभीर रूप का कारण बन सकता है जिसे हर्पेटिक केराटोकोनजक्टिवाइटिस कहा जाता है।

दूसरे स्थान पर वैरिसेला-जोस्टर वायरस (वीजेडवी) आता है  वीजेडवी चिकनपॉक्स और दाद का कारण बनता है, लेकिन आंखें प्रभावित होने पर यह नेत्रश्लेष्मलाशोथ का कारण भी बन सकता है। इसके अलावा कुछ एंटरोवायरस, जैसे कि कॉक्ससैकीवायरस, वायरल नेत्रश्लेष्मलाशोथ का कारण बन सकते हैं।

2.जीवाणु संक्रमण: जीसे हम बॅकटेरियल इन्फेक्शन कहते है जो आप के  नेत्रश्लेष्मलाशोथ रोग  का कारण बन सकते हैं। यह संक्रमित आंख को छूने या किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ कुछ भी चीजें साझा करने से फैलता है। इन जीवाणु मे स्टैफिलोकोकस ऑरियस, स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया, हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा, स्यूडोमोनास एरुगिनोसा, मोराक्सेला एसपीपी ओर  क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस शामिल है ।

3. एलर्जी:  एलर्जी के कारण आंखें लाल हो सकती हैं, खुजली हो सकती है और पानी आ सकता है। पराग, धूल, पालतू जानवरों की रूसी और अन्य एलर्जी इस प्रकार के नेत्रश्लेष्मलाशोथ को ट्रिगर कर सकते हैं।

4. परेशान करने वाले तत्व: आप के शहर का प्रदूषण, स्विमिंग पूल में धुएं, रसायनों या क्लोरीन जैसे जलन पैदा करने वाले पदार्थों के संपर्क में आने से आंखों में जलन और लालिमा हो सकती है, जिससे नेत्रश्लेष्मलाशोथ हो सकता है।

5. कॉन्टैक्ट लेंस: आज कल लोग हीरो की तरह कॉन्टैक्ट लेंस का इस्तमाल कर रहे है लेकिन इसके गलत तरीके से लगाए जाने पर, या साफ सफाई न करने पर  नेत्रश्लेष्मलाशोथ का खतरा बढ़ सकता है।

6. नवजात शिशु: नवजात शिशुओं में प्रसव के दौरान प्रसारित बैक्टीरिया के कारण नेत्रश्लेष्मलाशोथ विकसित हो सकता है। इस स्थिति पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। ओर यंहा सावधानी की जरुरत भी होती है इस पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे ।

 

छोटे बच्चों की आँख आना

मित्रों आमतौर पर यह देखा गया है कि बच्चों, विशेष रूप से स्कूल जाने वाले बच्चों में वयस्कों और नवजात शिशुओं की तुलना में नेत्रश्लेष्मलाशोथ यानि आँख आना का प्रमाण अधिक होता है । नवजात शिशुओं मे भी आँख आने का खतरा होता है जिसे नवजात नेत्रश्लेष्मलाशोथ कहा जाता है, जो कुछ जीवाणु संक्रमणों के कारण गंभीर हो सकता है।

लेकिन इस बीमारी के चपेट मे सबसे पहेल ओर जादा कोन आता है तो वो है स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे । जी हाँ स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों की आँख आना काफी सामान्य है जिस प्रकार सर्दी,खासी ओर बुखार मे सबसे पहेले बच्चे आते ठीक उसी प्रकार की यह समस्या है कुन्की छोटे बच्चे खेल कूद की वजह से बाहर वायरस की चपेट मे जल्दी आते है ओर यदि वह पहिली बार इस वायरस की चपेट मे आते है तो उनकी रोग प्रतिकारक शक्ति इतनी नहीं रहती की वे इन वायरस का मुकाबला कर सके ।

छोटे बच्चों की आँख आना इसके कुछ अन्य कारण भी है आए वैज्ञानिक तोर पर समझते छोटे बच्चों की आँख आना के प्रकार ओर इस के कुछ कारण

1 वायरल आई कंजंक्टिवाइटिस : बच्चों में, आँख आने का सबसे आम कारण वायरल संक्रमण है।बच्चों में नेत्रश्लेष्मलाशोथ के 50-75% मामले वायरल प्रकृति के होने का अनुमान है। बच्चे अक्सर स्कूल ओर अन्य बाहरी जगह जैसे खेल कूद का मैदान, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या स्कूल बस, जैसे जगह मे  वायरल संक्रमण के संपर्क में आते हैं, जिससे वायरल नेत्रश्लेष्मलाशोथ की संभावना अधिक होती है।

खास कर छोटे बच्चों मे एडेनोवायरस, हर्पीस सिम्प्लेक्स वायरस और एंटरोवायरस जैसे वायरस वायरल नेत्रश्लेष्मलाशोथ का कारण बन सकते हैं। जैसा की मैने पहेले बताया बच्चों के शरीर के लिए यह सभी वायरस एकदम नए होते है ओर उनकी प्रतिरक्षा प्रणालि को इन वायरस से लड़ने की आदत नहीं होती इसी लिए एक तो बच्चे इसकी चपेट मे जल्दी आते है ओर उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली इन इस वायरस से ठीक से पहिली बार मुकाबला करना सिख रही होती है इसलिए उनको पहिली बार दर्द भी अधिक होता है

2 बैक्टीरियल आई कंजंक्टिवाइटिस : बैक्टीरियल / जीवाणु संक्रमण, जो मुख्य रूप से स्टैफिलोकोकस ऑरियस, स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया, या हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा जैसे बैक्टीरिया के कारण होता है, भी नेत्रश्लेष्मलाशोथ का कारण बन सकता है।इससे जीवाणु संक्रमण होता है ।

बच्चों में नेत्रश्लेष्मलाशोथ के लगभग 30-50% मामले जीवाणुजन्य होते हैं। निकट संपर्क के कारण बच्चों में जीवाणु संक्रमण आसानी से फैल सकता है। इसका प्रमुख कारण धूल मिट्टी मे खेलना,बिना हात धोए किसी भी चीज को छूना किसी ओर संक्रमित व्यक्ति की चीजे इस्तमाल करना इस से बैक्टीरिया के संपर्क मे बच्चे आते है ओर यह  छोटे बच्चों की आँख आना प्रमुख कारण बनता है ।

मित्रों बैक्टीरियल / जीवाणु संक्रमण से नवजात  नेत्रश्लेष्मलाशोथ लगभग 1-2% नवजात शिशुओं में हो सकता है। इस प्रकार का नेत्रश्लेष्मलाशोथ मुख्य रूप से बच्चे के जन्म के दौरान मां से प्रसारित बैक्टीरिया के कारण होता है। नवजात शिशु के लिए डॉक्टर की जरुरत पड़ती है नवजात शिशुओं में जीवाणु संक्रमण को रोकने के लिए डॉक्टर अक्सर एंटीबायोटिक आई ड्रॉप या मलहम के साथ रोगनिरोधी उपचार देते  है।

मित्रों ऐसे किसी भी दवा को डॉक्टर से पूछे हुए लेना महापाप है कुन्की डॉक्टर को ही सही बीमारी का पता चलता है ओर शिशु के प्रकरती अनुसार उसे कोणसी दवा सही बैठती है ये डॉक्टर तय करते है बिना डॉक्टर से पूछे सस्ते हकीम बनकर मुन्ना भाइ एमबीबीएस न बने यही आप से हात जोड़कर विनंती है ।

3 एलर्जीक  आई कंजंक्टिवाइटिस : कुछ बच्चों में परागकण, धूल के कण, पालतू जानवरों की रूसी या अन्य से उत्पन्न एलर्जी के कारण नेत्रश्लेष्मलाशोथ विकसित हो सकता है।

 

बड़ों ओर छोटे बच्चों की आँख आना लक्षण 

मित्रों छोटे बच्चों की आँख आना ओर बड़ों की आँख आने के लक्षण एक समान ही है हाला की की आँख आने के प्रकार पर ये भिन्न होते है इसलिए आँख आने के प्रकार मे अलग अलग लक्षण कुछ इस प्रकार है ।

1. वायरल कंजंक्टिवाइटिस:

  • लालिमा: आंखों का सफेद भाग गुलाबी या लाल दिखाई देता है।
  • पानी जैसा स्राव: आंखों से साफ या थोड़ा सफेद स्राव होता है जीसे गीध आना भी कहा जाता है ।
  • आँखों मे खुजली: आँखों में खुजली या जलन महसूस हो सकती है।
  • आंखे फटना: आंखे फटने जैसी संवेदना हो सकती है ।
  • प्रकाश संवेदनशीलता: प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता (फोटोफोबिया) मौजूद हो सकती है।
  • गीध आना: सूखे स्राव के कारण जागने पर पलकें आपस में चिपक सकती हैं यह गीध आने की वजह से होता है ।

2. बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस:

  • लालिमा: वायरल नेत्रश्लेष्मलाशोथ के समान, आँखें लाल या गुलाबी दिखाई दे सकती हैं।
  • गाढ़ा स्राव: गीध आना खास कर इसमे पीला या हरा स्राव होता है जिसके कारण पलकें आपस में चिपक सकती हैं।
  • किरकिरापन: आँखों में किरकिरापन महसूस हो सकता है या ऐसा लग सकता है जैसे उनमें कुछ है।
  • जलन: आँखों में जलन और असुविधा हो सकती है।
  • पपड़ी: पपड़ीदार पलकें, खासकर जागने पर।
  • हल्की सूजन: पलकें थोड़ी सूजी हुई दिखाई दे सकती हैं।

3. एलर्जी कंजंक्टिवाइटिस :

  • खुजली: इस मे गंभीर खुजली एक प्रमुख लक्षण है।
  • लालिमा: आंखें तेज लाल या खूनी हो सकती हैं।
  • गीध पानी जैसा स्राव: साफ़, पानी जैसा स्राव आम है।
  • सूजन: मित्रों यंहा पलकें और कंजंक्टिवा में सूजन होती है।
  • संवेदनशीलता: लाइट या प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता का अनुभव हो सकता है।
  • कठोर स्राव: गाढ़ा, रेशेदार बलगम विकसित हो सकता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है किउपरोक्त लक्षण  प्रत्येक प्रकार के नेत्रश्लेष्मलाशोथ से जुड़े लक्षणों का एक सामान्य अवलोकन प्रदान करते हैं, व्यक्तिगत अनुभव भिन्न हो सकते हैं। यदि आप  आँख आने के लक्षणों का अनुभव कर रहे है, तो सटीक निदान और उचित उपचार के लिए डॉक्टर से टेस्ट करना जरूरी है।

निदान

यदि किसी बच्चे में उपरोक्त  लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना आवश्यक है।  बाल रोग विशेषज्ञ या नेत्र रोग विशेषज्ञ बच्चे की आंखों की गहन जांच करते है । पहेले तो डॉक्टर आँखों मे हुए संक्रमण का पता लगाते है उसके बाद   विशिष्ट कारण को निर्धारित करने के लिए डॉक्टर प्रयोगशाला परीक्षण के लिए आंखों से स्राव टेस्ट कर निर्धारित करते है ।

 

छोटे बच्चों की आँख आना उपचार इन हिंदी 

नवजात शिशुओं और बच्चों में नेत्रश्लेष्मलाशोथ का उपचार उसके कारण पर निर्भर करते है एक बार डॉक्टर आप के आँख आने का सही कारण पता कर वो इन्फेक्शन बैक्टीरियल है, वाइरल है या फिर एलर्जिक है यह तय करने के बाद उपचार करते है

1 वायरल कंजंक्टिवाइटिस: चूंकि वायरल संक्रमण आमतौर पर स्व-सीमित होते हैं, उपचार मुख्य रूप से लक्षणों के प्रबंधन पर केंद्रित होता है। डॉक्टर आप को एंटी वाइरल आई ड्रॉप लिखकर देते है जो आंखों को आराम देने और स्राव को दूर करने में मदद करते हैं। डॉक्टर आप[ को एंटी वाइरल दवा ओर वेदनाशंक दवा भी अति जरुरत है तो ही देते है । इसके अलावा  अच्छी स्वच्छता, जैसे बार-बार हाथ धोना, नेत्रश्लेष्मलाशोथ के प्रसार को रोकने में मदद कर सकता है

2 बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस  बैक्टीरियल संक्रमण का इलाज आमतौर पर एंटीबायोटिक आई ड्रॉप या मलहम से किया जाता है। डॉक्टर द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक दवाओं का पूरा कोर्स पूरा करना महत्वपूर्ण है। बिना डॉक्टर के परामर्श कोई भी दवा लेना खतरनाक हो सकता है । संक्रामक नेत्रश्लेष्मलाशोथ वाले व्यक्तियों के साथ निकट संपर्क से बचने से संचरण का जोखिम कम हो सकता है

3 एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस  मित्रों इसमे एलर्जी से बचना महत्वपूर्ण है जिस चीज कि भी बच्चे को एलर्जी है उसका पता कर् उससे बचना अतिआवश्यक है । ऐसे मामलों मे डॉक्टर सूजन को कम करने और लक्षणों से राहत देने के लिए एंटीहिस्टामाइन आई ड्रॉप या मौखिक एंटीहिस्टामाइन निर्धारित किए जा सकते हैं।

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आँख आना घरेलू उपचार

मित्रों नवजात शिशु ओर छोटे बच्चों की आँख आना पर डॉक्टर को दिखाना आवश्यक है । लेकिन वयस्क यानि 18 साल के ऊपर वाले व्यक्तियों को आमतोर पर डॉक्टर की आवश्यकता नहीं होती जब आप को आँख आने की कुछ हल्के लक्षण दिखे तो आप घरेलू नुसके आजमाकर अपनी आँख आने की पीड़ा को कम कर सकते है । आँख आना के घरेलू नुसको मे कुछ प्रकर्तिक ओर आयुर्वेदिकआई ड्रॉप भी शामिल है जिन्हे बनाकर आप आसानी से इसे इस्तमाल कर आँख आना  की पीड़ा से बच सकते है ।

आँख आना घरेलू उपचार

1. गर्म सेक: प्रभावित आंख पर गर्म पानी से सेक लगाने पर सूजन और परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है। एक साफ कपड़े को गर्म पानी में भिगोएँ, अतिरिक्त पानी निचोड़ें और इसे धीरे से बंद आँख पर 5-10 मिनट के लिए रखें। यदि दोनों आंखें प्रभावित हैं तो प्रत्येक आंख के लिए अलग-अलग कपड़े का उपयोग करके दिन में कई बार दोहराएं। याद रखे एक बार प्रयोग किया हुवा कपड़ा हमेशा साबुन से धो के ही दुबारा इस्तमाल करे ऐसा करने से आँखों की गंध से लगे हुए जीवाणु फिर से आँखों को लगने का खतरा नहीं रहता ।

2. ठंडी सिकाई: एलर्जिक नेत्रश्लेष्मलाशोथ के लिए या खुजली को कम करने के लिए, ठंडी सिकाई सुखदायक हो सकती है। यदि आप की आँखों मे अत्यधिक जलन है तो ठंडे पानी या बर्फ मे भिगोए हुए साफ कपड़े का उपयोग करें। इसे धीरे से बंद आंख पर 5-10 मिनट के लिए लगाएं। इससे आप को जलन मे काफी राहत मिलेगी ।

3. खारा घोल: नमक और पानी से बना खारा घोल आंखों को साफ करने और स्राव को दूर करने में मदद कर सकता है। 1 कप आसुत या उबले पानी (कमरे के तापमान पर ठंडा) में 1 चम्मच नमक मिलाएं। किसी भी पपड़ी या स्राव को धीरे से पोंछने के लिए घोल में साफ रूईया कपड़े से इसे अपनी प्रभावित आँखों पर लगाए ।

4. लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स: आँख आना पर आप को ओवर-द-काउंटर लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स आंखों में सूखापन और जलन से राहत दिलाने में मदद कर सकते हैं। संवेदनशील आंखों के लिए प्रिजर्वेटिव-मुक्त आई ड्रॉप का चयन करना सुनिश्चित करें।

5. शहद का घोल से बना आई ड्रॉप  : आयुर्वेद से पता चलता है कि शहद में जीवाणुरोधी गुण हो सकते हैं जो बैक्टीरियल नेत्रश्लेष्मलाशोथ आँख आना में मदद कर सकते हैं।  पतला घोल बनाने के लिए गर्म पानी में थोड़ी मात्रा में शहद (अधिमानतः मनुका शहद) मिलाएं और इसे आंखों के आसपास लगाने के लिए एक साफ कॉटन बॉल का उपयोग करें।

6. खीरे के टुकड़े: मित्रों फिल्मों मे ओर ब्यूटी पार्लर मे महिला को आप ने अक्सर ककड़ी के छिलके आँखों पर रखते हुए देखा होगा । आँख आना पर बंद आँखों पर खीरे के ठंडे टुकड़े रखने से सूजन कम करने और जलन से राहत पाने में मदद मिलती है।

7. एलोवेरा: मित्रों एलोवेरा भी अपने आयुयरवेदिक औषधि गुणों के लिए जाना जाता है  आँख आना पर जलन और लालिमा को शांत करने के लिए आंखों के चारों ओर एलोवेरा जेल  लगाया जा सकता है। मित्रों लेकिन सावधान रहें कि एलोवेरा जेल को  सीधे आंखों में न लगाए इससे आँखों मे जलन बढ़ सकती है आँखों के बाहर पलको पर ही इसका प्रयोग करे ।

8. गुलाब जल: आँख आना पर आप सुखदायक राहत के लिए कॉटन पैड को गुलाब जल में भिगोएँ और उन्हें अपनी बंद पलकों पर रखें।

9. हल्दी का पेस्ट: हल्दी पाउडर को थोड़ी मात्रा में पानी के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें। इसके सूजनरोधी गुणों के लिए इस पेस्ट को आंखों के आसपास लगाएं।

10. हाथ की स्वच्छता: आँख आना से निपटने के दौरान अच्छी हाथ की स्वच्छता का अभ्यास करना महत्वपूर्ण है। अपने बच्चे को बार-बार हाथ धोने के लिए प्रोत्साहित करें, खासकर प्रभावित आँखों को बार बार न छूए यदि छु लेते है तुरंत हात को धो ले इससे इन्फेक्शन बार बार फैलने का खतरा नहीं रहता

11. आंखें रगड़ने से बचें: अपने बच्चे को अपनी आंखों को रगड़ने या छूने से परहेज करने के लिए प्रोत्साहित करें, क्योंकि इससे जलन बढ़ सकती है और अगर यह संक्रामक है तो संक्रमण फैल सकता है।

12. उचित निपटान: यदि आंखों को साफ करने के लिए कॉटन बॉल, गॉज पैड या किसी अन्य सामग्री का उपयोग कर रहे हैं, तो प्रत्येक उपयोग के बाद उनका उचित निपटान करें। परस्पर-संदूषण को रोकने के लिए उनका पुन: उपयोग करने से बचें।

13. कॉन्टैक्ट लेंस से परहेज: यदि आप कॉन्टैक्ट लेंस पहनते है और आप की आंखे आयी है, तो आगे की जलन से बचने के लिए अस्थायी रूप से चश्मा लगाना सबसे अच्छा है। कॉन्टैक्ट लेंस बैक्टीरिया या जलन पैदा करने वाले तत्वों को फँसा सकते हैं और उपचार प्रक्रिया को लम्बा खींच सकते हैं।

14. पर्यावरणीय स्वच्छता: सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा जिन सतहों के संपर्क में आता है, जैसे तकिए, तौलिये और खिलौने, वे नियमित रूप से साफ और कीटाणुरहित हों। इससे परिवार के अन्य सदस्यों या दोस्तों में संक्रमण फैलने से रोकने में मदद मिलेगी।

23. हाइड्रेटेड रहें:  खूब पानी पीने से समग्र स्वास्थ्य लाभ हो सकता है और आपकी आँखों में नमी बनी रहेगी।

25. आराम: अपनी आंखों को उन गतिविधियों से दूर रखकर उचित आराम दें जो उन पर दबाव डालती हैं, जैसे कि अत्यधिक प्रकाश, धूल, मिट्टी, ओर धुँवा । टीवी मोबाईल ओर लैपटॉप कंप्युटर जैसे चीजों से आँख आने पर दूर रहे उचित आराम करे ।  न्यूज 21 सत्य का प्रहार आप के स्वस्थ जीवन की कामना करता है ।

 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (frequently asked question)

1. क्या कॉन्टैक्ट लेंस के उपयोग और नेत्रश्लेष्मलाशोथ के बढ़ते जोखिम के बीच कोई संबंध है?

हां, कॉन्टैक्ट लेंस के उपयोग और नेत्रश्लेष्मलाशोथ के बढ़ते जोखिम के बीच एक संबंध है। कॉन्टैक्ट लेंस बैक्टीरिया और जलन पैदा करने वाले तत्वों को फँसा सकते हैं, जिससे बैक्टीरियल या एलर्जिक नेत्रश्लेष्मलाशोथ हो सकता है। इस जोखिम को कम करने के लिए उचित स्वच्छता और लेंस की देखभाल महत्वपूर्ण है।

2. आंखों का संपर्क आँख आने का कारण बनता है ?

सीधे आँख से संपर्क करने से आँख नहीं आती है। यह  वायरस, बैक्टीरिया, एलर्जी से ही आती  है। यह मुख्य रूप से दूषित हाथों, सतहों या तरल पदार्थों के माध्यम से फैलता है। हालाँकि किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ आँख का संपर्क संचरण का एक संभावित मार्ग हो सकता है, लेकिन आँख से संपर्क करने का कार्य सीधे तौर पर नेत्रश्लेष्मलाशोथ का कारण नहीं बनता है।

3. क्या आँख  मारने से आँख आती है ?

नहीं, आँख मारने से आँख नहीं आती ये सब ब्रम्ह है आप निश्चिंत होके आँख मारे ओर याद रखे आँख मारने से आँख नहीं आती लेकिन हाँ लड़की जरूर आप को मार सकते है ।

4. क्या वातावरण ओर मे बदलाव ओर आँख आने मे कोई संबंध है ?

हाँ, भारत मे अक्सर बारिश के मॉसम के बाद वायरस फैलाव होता है महाराष्ट्र मे अभी भारी बारिश के बाद आँख आने वाले मरीजों की संख्या 1 लाख से भी उपर चली गयी है।

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